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भारत में नक्सलवाद का अंत करीब? मोदी सरकार की नीति ला रही रंग

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Byadmin

Jun 25, 2025

भारत में नक्सलवाद और अल्ट्रा वाम विचारधारा का अंत निकट दिखाई दे रहा है। दशकों पुरानी यह समस्या, जो कभी देश के बड़े हिस्से को प्रभावित करती थी, अब मोदी सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति और बहुआयामी रणनीति के कारण खात्मे की ओर है। 20वीं सदी के छठे दशक से चली आ रही यह हिंसक विचारधारा अब 21वीं सदी के तीसरे दशक में अपने अंतिम चरण में मानी जा रही है।

 

किसी भी लोकतांत्रिक देश में हिंसक आंदोलन के लिए कोई जगह नहीं है, और भारत जैसे शांतिप्रिय देश में बंदूक के दम पर समानता लाने वाले नक्सली आंदोलन का कोई औचित्य नहीं है। लंबे समय से पुलिस थानों, सरकारी स्थानों को लूटने और अपने विचारों को थोपने के लिए हिंसक तरीकों का इस्तेमाल करने वाले नक्सलियों को कुछ राजनीतिक दलों का प्रश्रय भी मिलता रहा। वे ग्रामीणों को भी एक खास राजनीतिक दल को वोट देने के लिए मजबूर करते थे।

 

मोदी सरकार ने 2014 में सत्ता में आने के बाद से इस सामाजिक और आपराधिक समस्या के समाधान की एक विस्तृत रूपरेखा तैयार की। गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में इस योजना पर तेजी से काम हुआ। सबसे पहले, नक्सलियों की फंडिंग और हथियारों की तस्करी के रास्तों की पहचान कर उन पर अंकुश लगाया गया। नक्सलियों से जुड़े राजनेताओं और राजनीतिक दलों को न्याय के कटघरे में लाने के प्रयास किए गए। इसरो की मदद से नक्सली शिविरों की पहचान की गई, और भारतीय सेना व अर्धसैनिक बलों को गुरिल्ला युद्ध के लिए प्रशिक्षित किया गया।

केवल बल प्रयोग ही नहीं, मोदी सरकार ने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास कार्यक्रमों को भी प्राथमिकता दी।

 

स्थानीय लोगों के साथ बेहतर नेटवर्क स्थापित कर उन्हें पहला प्रहरी बनाया गया। प्रधानमंत्री मोदी ने दिल्ली आने से पहले ही बस्तर जाकर माओवादियों से लोकतंत्र को स्वीकार करने और खून नहीं, पसीना बहाकर देश को हरा-भरा बनाने की अपील की थी। गृह मंत्री अमित शाह का यह दावा कि 2026 तक देश से नक्सलवाद का सफाया हो जाएगा, प्रधानमंत्री मोदी की दृढ़ इच्छाशक्ति को दर्शाता है।

 

लगभग छह दशकों तक नक्सलियों ने देश के जंगल, पहाड़ और खनिज क्षेत्रों में माफिया के रूप में अपनी पकड़ मजबूत कर ली थी। वे अंतर-राज्यीय सीमाओं पर अपनी गैरकानूनी गतिविधियों का संचालन करते थे और खुफिया अड्डे बनाकर सरकार को सीधी चुनौती देते थे। उन्होंने देश की राजनीति को प्रभावित करने के लिए एक बौद्धिक गैंग भी तैयार किया, जो उनकी हिंसक गतिविधियों को वर्ग संघर्ष का जामा पहनाता रहा। ये कथित बुद्धिजीवी अब भी शहरी नक्सली के रूप में काम करते हैं और कई राजनीतिक दलों से इनके तार जुड़े हुए हैं। गृह मंत्री अमित शाह खुले तौर पर कांग्रेस पर इन शहरी नक्सलियों को संरक्षण देने का आरोप लगाते हैं, जो सशस्त्र क्रांति की विचारधारा का प्रसार करते हैं और हथियार व गोला-बारूद उपलब्ध कराते हैं।

 

बीजेपी के उभार के साथ ही वाम विचारधारा का पतन भी देखा गया है। 2004 में लोकसभा की 61 सीटें जीतने वाली वामपंथी पार्टियां 2014 में 10 और 2019 में सिर्फ 4 सीटों पर सिमट गईं। 2024 के आम चुनाव में सीपीआई (एम) को 1.76%, सीपीआई को 0.49% और सीपीआई (एमएल) एल को सिर्फ 0.27% वोट मिले। केरल के अलावा वाम मोर्चा कहीं भी खड़े होने की स्थिति में नहीं है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि देश ने उनकी राजनीति को एक तरह से खारिज कर दिया है।

 

मोदी सरकार ने माओवादी उग्रवाद से निपटने के लिए एक व्यापक योजना बनाई है, जिसमें जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाई गई है। 31 मार्च, 2026 तक वामपंथी उग्रवाद को पूरी तरह से खत्म करने का प्रण लिया गया है। गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में सुरक्षा अभियान, विकास और पुनर्वास की एक एकीकृत योजना लागू की गई। ऑपरेशन कगार जैसे अभियानों से सैकड़ों नक्सलियों का खात्मा किया गया और हजारों ने आत्मसमर्पण किया। 2014 में जहां 126 जिले नक्सलवाद से प्रभावित थे, वहीं 2025 में केवल 6 सबसे अधिक प्रभावित जिले ही बचे हैं।

 

अमित शाह ने बल, सुशासन और समावेशी आउटरीच का एक त्रिस्तरीय फॉर्मूला अपनाया है। इस साल 200 से अधिक हथियारबंद नक्सलियों का सफाया किया गया है और 600 से अधिक ने आत्मसमर्पण किया है। 30 मई 2025 तक कुल 2824 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है। 14 मई 2025 को छत्तीसगढ़-तेलंगाना सीमा पर कर्रेगुट्टालु हिल (केजीएच) पर चलाए गए अब तक के सबसे बड़े ऑपरेशन में 31 नक्सली मारे गए।

 

आज, मोदी सरकार के कार्यकाल में नक्सली खतरे पर नियंत्रण महसूस किया जा सकता है। जिन आदिवासियों को नक्सलियों का समर्थन करने के लिए मजबूर किया गया था, वे अब उनके खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। आदिवासी अधिकारों के लिए हो रहा काम नक्सल समस्या को तय समय सीमा में हल करने का विश्वास दिलाता है। अब यह आवाज जोर से उठ रही है कि माओवाद और नक्सलवाद को छोड़कर मुख्यधारा में वापस आने का समय आ गया है।


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