
दरभंगा: पर्यावरण संरक्षण व स्वच्छता का संदेश देनेवाला मिथिला का लोकपर्व जूड़-शीतल मंगलवार को क्षेत्र में हर्षोल्लास के साथ मनाया गया.
परंपरानुसार लोगों ने अपने से छोटे के सिर पर शीतल जल देकर जुड़ायल रहू का आशीर्वाद दिया. वहीं छोटों ने बड़ों का चरण स्पर्श कर उनसे आशीर्वाद लिया. पूर्व में ऐसी परंपरा थी कि आज के दिन पुरैनी के पत्ते पर एक दिन पूर्व बने बड़ी-भात ही लोग ग्रहण करते थे. साथ ही उसी भात व बड़ी से घर समेत चूल्हे की भी पूजा की जाती थी.

इसलिए दूसरे दिन के पर्व को लोग बसिया पावन के नाम से भी जानते हैं. उल्लेखनीय है कि मिथिला के सभी लोकपर्व का कुछ न कुछ वैज्ञानिक कारणों से सीधा संपर्क है.

इसमें जूड़-शीतल पर्व स्वच्छता व पर्यावरण संरक्षण की दृष्टिकोण से मनाया जाता है. आज के दिन लोग गांव की गली-मोहल्लों की साफ-सफाई के साथ पर्यावरण की सुरक्षा व संवर्धन के लिए बगीचों में पेड़-पौधों की सिंचाई करते हैं. इससे समाज में स्वच्छता अभियान व स्वच्छ पर्यावरण को बल मिलता था.
इस दौरान हंसी-ठिठोले के साथ सामाजिक समरसता का स्पष्ट भाव दिखता था. पूर्व में तो लोग एक-दूसरे के शरीर में कीचड़ लगाकर आपसी भाईचारा का एहसास कराता था, लेकिन आधुनिक युग में बासी खाना व धुरखेल को स्वास्थ्य के लिए हानिकारक माना गया है.
इसलिए अब विकसित समाज में यह पौराणिक प्रथा प्राय: समाप्त हो चुकी है. केवल पर्व की रस्म अदायगी की जाती है. बेनीपुर के प्रो. सुरेश सिंह, डखराम के सुरेंद्र झा आदि ने बताया कि वर्तमान में केंद्र व बिहार सरकार द्वारा स्वच्छता व पर्यावरण संरक्षण के लिए विशेष अभियान चला लोगों को इसके प्रति जागृत किया जा रहा है, लेकिन मिथिला के लोगों ने स्वच्छता व पर्यावरण संरक्षण को अपने धर्म शास्त्र का अंग बनाकर सदियों पूर्व से ही इसे लोकपर्व से जोड़कर जूड़-शीतल के रूप में हर साल मनाते आ रहे हैं.
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