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सरायकेला: ‘रन फॉर गजराज’ से ‘बर्ड फेस्टिवल’ तक— ग्राम सभाओं की अनदेखी पर उठे सवाल

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Mar 11, 2026

 

 

सरायकेला/चांडिल: चांडिल अनुमंडल क्षेत्र के एक स्थानीय होटल में आयोजित प्रेस वार्ता के दौरान माझी बाबा मनोहर हांसदा और सत्यनारायण मुर्मू ने दलमा वाइल्ड लाइफ सेंचुरी के तराई क्षेत्र में स्थित 135 गांवों की अनदेखी का गंभीर मुद्दा उठाया। उन्होंने सीधे तौर पर प्रशासन से सवाल किया कि क्या विकास की योजनाएं ग्राम सभाओं की सहमति से बन रही हैं या गांवों को दरकिनार किया जा रहा है?

 

स्थानीय युवाओं की उपेक्षा और आर्थिक बाधा

 

प्रेस वार्ता में बताया गया कि “रन फॉर गजराज” जैसे आयोजनों में बाहरी प्रतिभागियों को तो मंच मिला, लेकिन स्थानीय युवाओं को न तैयारी का अवसर दिया गया और न ही प्राथमिकता। अब आगामी ‘बर्ड फेस्टिवल’ के लिए 1500 रुपये का पंजीकरण शुल्क तय किया गया है।

 

वक्ताओं का कहना है कि आर्थिक संघर्ष झेल रहे स्थानीय छात्र-छात्राओं के लिए इतनी बड़ी राशि अवसर नहीं, बल्कि एक बाधा है।

 

ईको-सेंसिटिव ज़ोन: नियम सख़्त, भागीदारी शून्य

ईको-सेंसिटिव ज़ोन के नाम पर 135 गांवों में जमीन, जंगल और निर्माण कार्यों पर कड़े प्रतिबंध लागू हैं। माझी बाबा ने सवाल उठाया कि “जब नियम गांवों पर थोपे जाते हैं, तो निर्णय प्रक्रिया में ग्राम सभा की भागीदारी क्यों नहीं सुनिश्चित की जाती?” उन्होंने आरोप लगाया कि पारंपरिक अधिकारों की निगरानी तो हो रही है, लेकिन योजनाओं के निर्माण में ग्रामीणों की राय शून्य है।

 

दिखावा नहीं, जमीनी विकास की मांग

 

दलमा के गांवों में आज भी आदिवासी और मूलवासी परिवार शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ग्रामीणों की मांग है कि:

 

आयोजनों पर खर्च होने वाली राशि का कुछ हिस्सा सीधे गांवों की शिक्षा और स्वास्थ्य पर लगे।

 

योजनाओं के केंद्र में ग्रामीणों का सम्मान और उनकी भागीदारी हो।

 

स्थानीय युवाओं के लिए संसाधनों और उचित मार्गदर्शन की व्यवस्था की जाए।

 

मामला विरोध का नहीं, बल्कि प्राथमिकताओं का है। वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि विकास और पर्यावरण संरक्षण तभी सार्थक होगा, जब वह 135 गांवों की उपेक्षा बंद कर उन्हें मुख्यधारा में शामिल करेगा।


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