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सरायकेला में ‘उत्कल दिवस’ की धूम: भाषा और संस्कृति के संरक्षण का गूंजा शंखनाद

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Apr 2, 2026

सरायकेला | झारखंड की सांस्कृतिक राजधानी कहे जाने वाले सरायकेला की मिट्टी बुधवार को ओड़िया गौरव की खुशबू से महक उठी। स्थानीय उत्कलमणि आदर्श पाठागार के तत्वावधान में आयोजित ‘उत्कल दिवस’ समारोह ने न केवल इतिहास की यादें ताजा कीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी के लिए अपनी जड़ों से जुड़े रहने का एक सशक्त संदेश भी दिया। 1 अप्रैल, 1936 को भाषाई आधार पर ओड़िशा राज्य के गठन की स्मृति में आयोजित यह कार्यक्रम हर्षोल्लास और पारंपरिक गरिमा का अनूठा संगम रहा।

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​महापुरुषों को नमन और कार्यक्रम का आगाज

​समारोह का विधिवत शुभारंभ पाठागार के नाटक भवन में किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, ओड़िशा के निर्माता उत्कल गौरव मधुसूदन दास और समाज सुधारक उत्कलमणि गोपबंधु दास के चित्रों पर माल्यार्पण और दीप प्रज्वलन के साथ हुई।

​श्रद्धांजलि सभा के दूसरे चरण में पाठागार परिसर में स्थापित उत्कलमणि गोपबंधु दास की आदमकद प्रतिमा पर स्थानीय बुद्धिजीवियों और गणमान्य नागरिकों ने पुष्प अर्पित किए। इस दौरान वातावरण “वंदे उत्कल जननी” के नारों से गुंजायमान रहा। उपस्थित वक्ताओं ने कहा कि इन महापुरुषों का त्याग ही है कि आज ओड़िया संस्कृति विश्व पटल पर अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए है।

​सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने बांधा समां

​उत्सव के दौरान ओड़िया भाषा की मिठास और संगीत की सुरीली लहरें हर किसी के हृदय को छू गईं। ओड़िया शिक्षकों और पाठागार के सदस्यों ने ओड़िशा के राजकीय गान “वंदे उत्कल जननी” की सामूहिक और भावपूर्ण प्रस्तुति दी। इसके साथ ही “पथ एबे सरि नाहीं…” जैसे कालजयी गीतों ने उपस्थित जनसमूह को भाव-विभोर कर दिया। गीतों के माध्यम से न केवल संघर्ष की गाथा सुनाई गई, बल्कि ओड़िया अस्मिता को बनाए रखने की प्रेरणा भी दी गई।

​वक्ताओं के विचार: भाषा ही हमारी पहचान

​समारोह को संबोधित करते हुए विभिन्न वक्ताओं ने उत्कल दिवस के ऐतिहासिक महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि आधुनिकता के दौर में क्षेत्रीय भाषाएं पीछे छूट रही हैं। वक्ताओं ने जोर देकर कहा:

​”ओड़िशा और सरायकेला का संबंध सदियों पुराना है। हमारी भाषा, कला और परंपरा ही हमारी असली थाती है। इसे अक्षुण्ण बनाए रखना केवल एक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि अपनी मिट्टी के प्रति हमारा कर्तव्य है।”

​सभी उपस्थित सदस्यों ने एक स्वर में ओड़िया भाषा और संस्कृति के संरक्षण के लिए निरंतर कार्य करने का संकल्प लिया।

​इस गरिमामयी उत्सव में समाज के हर वर्ग की भागीदारी देखने को मिली। कार्यक्रम में मुख्य रूप से सुशांत महापात्र, सुदीप पटनायक, जलेश कवि, कलहु महापात्र, काशीनाथ कर, कार्तिक परीक्षा, दुखरम साहू और बद्रीनारायण दरोगा उपस्थित थे।

​शिक्षा जगत से जुड़ी हस्तियों ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, जिनमें प्रमुख रूप से:

​शिक्षिकाएं: रीता रानी नंदा, अर्चना दास, संध्या कर, गीतांजलि महंती और रश्मिता दास।

​शिक्षक: शक्ति पति, रूपम राणा, दुखनू कर और चक्रधर महान्ती।

​जनभागीदारी और उत्साह

​कार्यक्रम के समापन पर पाठागार प्रबंधन ने उपस्थित सभी ओड़िया भाषी लोगों और बुद्धिजीवियों का आभार व्यक्त किया। काफी संख्या में उपस्थित आम नागरिकों ने अपनी मातृभाषा और मिट्टी के प्रति अटूट प्रेम प्रदर्शित किया। समारोह के अंत में प्रसाद वितरण किया गया और भविष्य में भी इसी तरह के भाषाई और सांस्कृतिक आयोजनों को बढ़ावा देने की बात कही गई।


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