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​झरिया का मगन होटल रहा बौद्धिक गतिविधियों का साक्षी, जहाँ हर सुबह और शाम जूटते थे प्रमुख लोग

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Aug 13, 2025

 

 

​झरिया की धरती ने केवल कोयले की खानों को ही नहीं, बल्कि आजादी की चिंगारी को भी अपनी कोख में पाला। इसी चिंगारी को हवा देने वाला एक ऐसा केंद्र था, जिसे आज की पीढ़ी शायद ही जानती हो—झरिया का मगन होटल।

 

यह सिर्फ एक जलपान गृह नहीं था, बल्कि वह मंच था जहाँ आजादी के दीवाने, बुद्धिजीवी और समाज के अग्रदूत मिलकर देश के भविष्य पर मंथन करते थे। यह होटल सौ साल से भी अधिक समय तक झरिया के हृदय में धड़कता रहा, जहाँ गरमा-गरम चाय की चुस्कियों के साथ अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ रणनीति बनती थी।

​झरिया मेन रोड के पश्चिमी किनारे, देशबंधु सिनेमा के पास, यह ऐतिहासिक स्थल हाल ही में बंद हुआ है। आज जहाँ दूसरी दुकानें खड़ी हैं, वहाँ कभी नगर का ‘कॉफी हाउस’ हुआ करता था। यह नाम इसे यूं ही नहीं मिला, बल्कि इसकी भूमिका ने इसे यह सम्मान दिलाया। जिस तरह कलकत्ता के कॉलेज स्ट्रीट का कॉफी हाउस छात्रों और बुद्धिजीवियों का मिलन स्थल था, जिसने देश को कई महान विभूतियाँ दीं, उसी तरह झरिया का मगन होटल भी स्थानीय राजनीतिक नेताओं, डॉक्टरों, शिक्षकों, समाजसेवियों, पत्रकारों, साहित्यकारों और कोयला उद्योग से जुड़े व्यक्तित्वों का एक खुला सार्वजनिक मंच था।

 

यह बौद्धिक गतिविधियों का साक्षी रहा, जहाँ हर सुबह और शाम विचारों का आदान-प्रदान होता था।

​दरअसल, कलकत्ता का कॉफी हाउस स्वयं पेरिस के 15वीं शताब्दी के प्रसिद्ध कॉफी हाउस का एक प्रतिरूप था। पेरिस के उस कॉफी हाउस ने फ्रांसीसी क्रांति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और बुद्धिजीवियों के लिए एक उर्वर भूमि प्रदान की थी। ठीक उसी तरह, मगन होटल ने भी भारत की आजादी की लड़ाई में झरिया के बुद्धिजीवियों को एक साथ आने का अवसर दिया।

 

​मगन होटल का यह नाम इसके मालिक मगन भाई जानी के नाम पर पड़ा, लेकिन इसे ऐतिहासिक गरिमा मिली इसके ग्राहकों के कारण। इस होटल के खुलने की कहानी भी उतनी ही दिलचस्प है, जितनी इसकी भूमिका। 1890 के दशक में जब झरिया में कोयला उद्योग फलने-फूलने लगा, तो गुजरात, पंजाब, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों से लोग रोजगार और व्यापार के लिए यहाँ आने लगे। इन्हीं में से एक थे गुजरात के सुरेंद्रनगर जिले के हरबद गाँव से आए पंडित उद्धव भाई जानी और उनके भाई छोटेलाल जानी।

​उद्धव भाई ने शुरू में स्टेशन रोड स्थित सत्यनारायण मंदिर में पूजा-पाठ का काम किया और खाली समय में फतेहपुर मोहल्ले में गुजराती परिवारों के बीच पेड़ा, चिउड़ा, गठिया-भुजिया जैसी चीजें बेचते थे। इन खाद्य सामग्रियों ने प्रवासी गुजरातियों को अपने ‘देस’ का स्वाद दिलाया। दूसरी ओर, छोटेलाल जानी कोयला व्यापार में परामर्श देते थे और सामाजिक कार्यों में सक्रिय रूप से भाग लेते थे। उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आज भी कतरास मोड़ से लेकर झरिया स्टेशन रोड-बालूगद्दा तक का मेन रोड उनके नाम पर ‘छोटेलाल जानी रोड’ के रूप में जाना जाता है।

 

​उद्धव भाई का गुजराती जलपान का व्यवसाय तेजी से बढ़ने लगा, तो उन्होंने अपने तीनों बेटों—बाबूभाई, मनसुख और मगनलाल—को भी झरिया बुला लिया। फतेहपुर मोहल्ले में उन्होंने फरसान (गुजराती नाश्ता) की एक स्थायी दुकान खोली। इसी दुकान में प्रशिक्षण पाकर, उनके सबसे छोटे बेटे मगनलाल ने मेन रोड पर एक छोटी सी गुमटी लगाई। मगन की कर्मठता, फुर्ती, मिलनसार स्वभाव और हमेशा मुस्कुराता हुआ चेहरा ग्राहकों को सहज ही उनकी ओर खींचता था। आश्चर्य की बात यह है कि एक किशोरवय बालक मगन की यह चाय की दुकान, जिसे शुरू में ‘कच्छी चाय दुकान’ कहा जाता था, लगभग दस वर्षों में प्रसिद्ध ‘मगन होटल’ बन गई।

 

​धीरे-धीरे मगन भाई ने अपनी दुकान का विस्तार किया। फुटपाथ पर कुछ बेंचें लगाईं, और बाद में लोहे-लकड़ी की आरामदायक बेंचों की कतारें आमने-सामने बिछा दीं। 1920 के दशक तक, ये बेंचें केवल बैठने की जगह नहीं थीं, बल्कि नगर की प्रमुख हस्तियों और स्वतंत्रता-प्रेमी नौजवानों के विचार-विमर्श का प्रमुख केंद्र बन गईं।

 

​मगन होटल की इन बेंचों पर बैठने वालों में कई नामी-गिरामी शख्सियतें शामिल थीं। यहाँ कांग्रेस पार्टी के प्रखर नेता मास्टर किशोरीलाल लोरैया, कोलियरी मालिक संघ के कन्हैयालाल बी. मोदी, प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. सुधांशु सरकार, मजदूर नेता स्वामी विश्वानंद, समाजवादी पार्टी के नेता और पत्रकार मुकुटधारी सिंह, ‘सर्चलाइट’ के प्रतिनिधि धीरज मेहता, डीएवी स्कूल के प्रधानाध्यापक जी.एन. आचार्या, झरिया अकादमी के सहायक प्रधानाध्यापक सीताराम सिंह, झरिया के पहले विधायक शिवराज प्रसाद के पिता डॉ. रामटहल लाल, शिक्षक और पत्रकार लखनलाल केशरी, गुजराती स्कूल के शिक्षक हंसराज ठक्कर, और कोलियरी मालिकों में सेठ फूलचंद अग्रवाल, सांसद परमेश्वर लाल अग्रवाल के पिता बनवारी लाल अग्रवाल और चीन कोठी के मालिक बाबूलाल ओझा जैसे प्रमुख लोग शामिल थे।

 

​इस होटल में देश-विदेश की राजनीति और अर्थनीति पर गरमा-गरम बहसें चलती थीं। यहाँ अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों की आलोचना होती थी और आजाद भारत का सपना देखा जाता था। यह सब कुछ अंग्रेजी सरकार की नाक के नीचे हो रहा था। यही कारण था कि मगन भाई को अक्सर मानभूम के अनुमंडल पदाधिकारी के यहाँ हाजिरी देनी पड़ती थी। प्रशासन को शक था कि इस होटल में राजद्रोही गतिविधियां होती हैं। हालांकि, मगन भाई कभी इन धमकियों से नहीं डरे। वे सदा अपने काम में मग्न रहते थे और अपने ग्राहकों को विचारों का आदान-प्रदान करने की पूरी आजादी देते थे। उनका हंसमुख चेहरा और दृढ़ निश्चय ही उनकी सबसे बड़ी ताकत थी।

​इस तरह, मगन होटल ने न सिर्फ झरिया के लोगों को जलपान कराया, बल्कि उन्हें एक ऐसा मंच भी दिया, जहाँ वे बिना किसी डर के अपने विचार व्यक्त कर सकें। यह होटल सिर्फ ईंट और गारे का बना ढाँचा नहीं था, बल्कि झरिया के बौद्धिक और राजनीतिक इतिहास का एक जीवंत हिस्सा था। भले ही आज यह होटल अपनी जगह पर नहीं है, लेकिन इसकी यादें और इतिहास आज भी झरिया के उन बुजुर्गों के दिलों में जिंदा हैं, जिन्होंने यहाँ बैठकर आजादी का सपना देखा था।


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