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छऊ महोत्सव के नाम पर परंपरा से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं: राजा प्रताप आदित्य सिंह देव

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Mar 14, 2026

 

सरायकेला: सरायकेला रियासत के उत्तराधिकारी राजा प्रताप आदित्य सिंह देव ने शनिवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर चैत्र पर्व और छऊ नृत्य की मौलिकता को लेकर कड़ा रुख अपनाया है।

“महोत्सव” नहीं, यह हमारी “आस्था” है

राजा साहब ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि चैत्र पर्व सरायकेला की सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा है। उन्होंने कहा, “जब से सरायकेला जिला बना है, तब से चैत्र पर्व को ‘महोत्सव’ का रूप देकर इसमें विभिन्न बाहरी सांस्कृतिक कार्यक्रमों को सम्मिलित किया जा रहा है। इससे हमारे पूर्वजों की परंपरा और पूजा-पाठ की शुचिता धूमिल हो रही है।”

 

प्रेस वार्ता के दौरान उन्होंने ऐतिहासिक तथ्यों को रखते हुए बताया कि:

सरायकेला के भारत संघ में विलय के समय भारत सरकार के साथ जो समझौता (Agreement) हुआ था, उसमें यहाँ की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं को यथावत रखने की शर्त शामिल थी। प्रशासन को उस एग्रीमेंट का सम्मान करना चाहिए।

भौगोलिक रूप से सरायकेला भले ही अब झारखंड का हिस्सा है, लेकिन यहाँ की आत्मा उड़िया संस्कृति से जुड़ी है। यहाँ के सभी रीति-रिवाज आज भी ‘पुरी पंचांग’ के आधार पर तय होते हैं।

चैत्र मास का अंतिम दिन इस पर्व की आखिरी रात होती है, जिसका अपना एक विशेष आध्यात्मिक और अनुष्ठानिक महत्व है।

*प्रशासन को सकारात्मक सुझाव*

राजा प्रताप आदित्य सिंह देव ने विरोध के साथ-साथ प्रशासन को एक विकल्प भी दिया है। उन्होंने सुझाव दिया कि:

“यदि प्रशासन महोत्सव का बड़ा आयोजन करना चाहता है, तो उसे 15 दिन बाद 30 अप्रैल को किया जाए, जो जिला स्थापना दिवस भी है। उस आयोजन में हम पूरा सहयोग करेंगे और हर्षोल्लास के साथ भाग लेंगे। लेकिन चैत्र पर्व के पारंपरिक अनुष्ठानों के साथ कोई छेड़छाड़ न की जाए।”

राजा साहब के इस बयान के बाद अब यह देखना दिलचस्प होगा कि जिला प्रशासन चैत्र पर्व के आयोजन में परंपरा और आधुनिकता के बीच कैसे संतुलन बनाता है।


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