
सरायकेला : जिला के चांडिल अनुमंडल क्षेत्र के दलमा वाइल्ड लाइफ सेंचुरी अंतर्गत में संविधान आदिवासी अधिकार और ग्राम स्वशासन पर हो रहे हमलों के खिलाफ अब जनता सड़कों पर उतरने को तैयार है। दलमा क्षेत्र ग्राम सभा सुरक्षा मंच, कोल्हान के आह्वान पर 25 फरवरी 2026 को माकुलाकोचा फुटबॉल मैदान में एक उग्र जन सम्मेलन आयोजित किया जाएगा ।

इस सम्मेलन में जल-जंगल-जमीन बचाने के लिए लोग एकजुट होंगे और आंदोलन को निर्णायक धार देने का प्रयास करेंगे। ग्राम सभा सुरक्षा मंच के सदस्यों ने दो टूक कहा है कि दलमा क्षेत्र में पाँचवीं अनुसूची, अनुच्छेद 244(1), PESA Act 1996, वन अधिकार कानून 2006 और भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 को खुलेआम कुचला जा रहा है।

आदिवासी अधिकार और ग्राम स्वशासन पर हो रहे लगातार हमलों के खिलाफ अब जनता सड़कों पर उतरने को तैयार है। दलमा क्षेत्र ग्राम सभा सुरक्षा मंच, कोल्हान के आह्वान पर 25 फरवरी 2026 को माकुलाकोचा फुटबॉल मैदान में एक उग्र जन सम्मेलन आयोजित किया जाएगा। एक होटल में आज आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में आंदोलन को और तेज करने का खुला ऐलान किया गया।
प्रेस वार्ता में वक्ताओं ने दो टूक कहा कि दलमा क्षेत्र में पाँचवीं अनुसूची, अनुच्छेद 244(1), PESA Act 1996, वन अधिकार कानून 2006 और भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 को खुलेआम कुचला जा रहा है। ग्राम सभा की अनुमति के बिना फैसले थोपे जा रहे हैं, जल–जंगल–जमीन छीनी जा रही है और आदिवासी समाज को अपने ही क्षेत्र में बेदखल करने की साजिश चल रही है।
वक्ताओं ने चेतावनी दी कि अगर संविधान और ग्राम सभा के अधिकारों का सम्मान नहीं किया गया तो यह आंदोलन सिर्फ सम्मेलन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि जनांदोलन का रूप लेगा। अब चुप रहने का समय खत्म हो चुका है और दलमा की धरती अपने अधिकारों की लड़ाई खुद लड़ेगी।
दलमा टाइगर सुकलाल पहाड़िया ने कहा कि दलमा सेंचुरी की पहाड़ियां सिर्फ पत्थर नहीं, बल्कि हमारी पहचान और अस्तित्व हैं। विगत पांच वर्षों से गज परियोजना में पर्याप्त भोजन पानी की कमी होने के कारण आज सेंचुरी जंगली हाथियों की झुंड भोजन पानी की तलाश में ईचागढ़ विधानसभा क्षेत्र में डेरा डाले हुए हैं। दूसरी ओर पर्यटकों बढ़ावा देने के लिए विभिन्न प्रकार योजना को लेकर वन एंब पर्यावरण विभाग द्वारा तत्पर लगे हुए हैं। आज सेंचुरी की जंगल सिमट रहा है,हाथी भ्रमणशील जंगल सिमटने लगा है। बड़े बड़े कम्पनियों तराई क्षेत्र में लगा हुआ हे। आज के दर्शक में जंगल ओर वन्य जीवजंतु असुरक्षित देखा गया। महावीर हांसदा ने इसे आदिवासी समाज के भविष्य की निर्णायक लड़ाई बताया। देवनाथ सिंह मुंडा, राधेश्याम भूमिज, बुद्धेश्वर हेम्ब्रम और पारंपरिक लाया भूषण पहाड़िया ने एक स्वर में कहा कि यदि शोषण और दमन नहीं रुका तो संघर्ष और तेज होगा।
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