
पंकज ठाकुर

बड़कागांव। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की राष्ट्रीय सचिव पूर्व विधायक अंबा प्रसाद ने एक बार फिर हजारीबाग सांसद मनीष जायसवाल पर तीखा हमला किया है।

ज्ञात हो कि कुछ दिन पूर्व मनीष जायसवाल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए दहेज देने की बात को सही ठहराया था और कहा था कि दहेज देना और लेना एक परंपरा है।
इस बात पर पूर्व विधायक अंबा प्रसाद ने तीखा हमला करते हुए कहा कि अपराध को परंपरा का नाम देकर मनीष जायसवाल सीधे दहेज प्रथा को अपना खुला समर्थन दे रहे हैं।
आगे उन्होंने कहा कि हजारीबाग के माननीय सांसद मनीष जायसवाल जी का हालिया बयान अत्यंत विचलित करने वाला है, जिसमें उन्होंने कहा कि “दहेज देना कोई गुनाह नहीं है बल्कि ये परंपरा है।” यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक माननीय जनप्रतिनिधि को ‘उपहार’ (Gift) और ‘दहेज’ (Dowry) के बीच का अंतर समझ में नहीं आ रहा है। वे इन दोनों शब्दों का एक ही अर्थ निकालकर न केवल भ्रम फैला रहे हैं, बल्कि अर्थ का अनर्थ भी कर रहे हैं। कानून के अनुसार, स्वेच्छा से उपहार लेना या देना कोई अपराध नहीं है और न ही इस पर कोई कानूनी पाबंदी है। परंतु, दहेज लेना और देना दोनों ही दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3 के तहत एक गंभीर और संज्ञेय अपराध है। कानून में इसके लिए न्यूनतम 5 साल की सजा और 15,000 रुपये जुर्माने का स्पष्ट प्रावधान है। इतना ही नहीं, इस कुप्रथा को सामाजिक रूप से प्रोत्साहन देने वाले व्यक्तियों पर भी इसी अधिनियम की धारा 3 और धारा 8A के तहत उतनी ही कड़ी कानूनी कार्यवाही और सजा का प्रावधान है।
*क्या है नियम*
प्रशासनिक स्तर पर देखा जाए तो राज्य के हर जिले में DSWO (जिला समाज कल्याण पदाधिकारी) तैनात हैं और संबंधित मंत्रालय के पास भी इस अधिनियम के तहत स्वतः संज्ञान लेकर तत्काल कार्यवाही करने की शक्ति है। इसके बावजूद, एक जिम्मेदार पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा खुलेआम कानून का उल्लंघन करने वाले बयान पर किसी ने कोई संज्ञान नहीं लिया, जो शासन-प्रशासन की सक्रियता पर सवाल खड़ा करता है।
अंबा प्रसाद ने कहा कि मीडिया लोकतंत्र का सबसे मजबूत स्तंभ है, मीडिया का नैतिक उत्तरदायित्व है कि वे दहेज जैसी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ बिना किसी डर के मुहिम छेड़ें। जनता, पुलिस प्रशासन, सरकार और न्यायालयों तक यह कड़ा संदेश जाना चाहिए कि ऐसी कुप्रथाओं को बढ़ावा देने वालों पर सख्त कार्यवाही होनी चाहिए। पूर्व विधायक ने कहा कि महिला होने के नाते, ऐसे बयानों से अत्यंत असहज और असुरक्षित महसूस करती हूँ, क्योंकि यह समाज को पीछे धकेलने वाली सोच है।
जो राजनीतिक दल हमेशा ‘विकास’ की बात करते हैं, उन्हीं के एक सांसद सामाजिक विकास के स्तर को इस कदर कुचल रहे हैं। प्रदेश की महिलाओं को अब सचेत होने की जरूरत है क्योंकि आपने ही ऐसे व्यक्तियों को अपना प्रतिनिधि चुना है। यह स्थिति वैसी ही है जैसे अपने ही घर में डकैती डालने के लिए डाकुओं को आमंत्रित करना। ये बातें ‘मिसरी लगी छुरी’ की तरह हैं, जो अभी सुनने में मीठी लग सकती हैं, लेकिन भविष्य में केवल दर्द और सामाजिक पतन ही देंगी।
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