
पश्चिमी सिंहभूम के चाईबासा में आदिवासी उरांव समाज द्वारा खद्दी फग्गू (सरहुल) का पर्व पूरी श्रद्धा और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया जा रहा है। होलिका दहन के तीसरे दिन से शुरू हुआ यह अनुष्ठान शुक्रवार तक विभिन्न चरणों में संपन्न हो रहा है, जिसमें समाज की सुख-समृद्धि और आरोग्य की कामना की जा रही है।

पाहन का शाही स्नान और पारंपरिक स्वागत

उत्सव की शुरुआत अखाड़ों में मुर्गा बलि और चाला मंडप (सरना स्थल) में विधि-विधान से पूजा-अर्चना के साथ हुई। पूजा के पश्चात पाहन, पुजारी और सहयोगी पनभरवा जब ढोल-नगाड़ों की थाप पर नाचते हुए मोहल्ले के चौक-चौराहों पर पहुंचे, तो महिलाओं ने उनका अभूतपूर्व स्वागत किया। परंपरा के अनुसार, महिलाओं ने पाहन को लोटे के जल से नहलाया और सरसों तेल लगाया। इस दौरान पूरा मोहल्ला पानी की बौछारों से सराबोर हो गया, जो आपसी प्रेम और भाईचारे का प्रतीक है।
तिलाई फूल और मिट्टी की छाप का रिवाज
गुरुवार और शुक्रवार को बान टोला अखाड़ा सहित सातों अखाड़ों में विशेष रौनक रही। मान्यता के अनुसार, प्रत्येक घर के दरवाजे के दोनों ओर लाल और सफेद मिट्टी से ‘छापा’ मारा गया और ‘तिलाई फूल’ खोंसने की रस्म पूरी की गई। समाज के लोगों का मानना है कि इस रिवाज से घर-परिवार से दुख-तकलीफें और नकारात्मक शक्तियां दूर रहती हैं तथा बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और नौकरी में उन्नति होती है।
पुरखों के गीतों पर थिरके कदम
पूरा क्षेत्र “लुहुड़-लुहुड़, डलाई-डलाई… सैर फग्गू मानोत” जैसे पारंपरिक गीतों और वाद्य यंत्रों की गूंज से जीवंत उठा। इस अवसर पर समाज के मुखिया लालू कुजूर, पाहन फागु खलखो, पनभरवा दुर्गा कुजूर और मंगरू टोप्पो ने मुख्य भूमिका निभाई।
कार्यक्रम में चमरू लकड़ा, राजु तिग्गा, सीताराम मुंडा, शम्भू टोप्पो, राजेंद्र कच्छप, बुधराम कोया समेत समाज के सैकड़ों पुरुष, महिलाएं और युवा उपस्थित रहे। सभी ने चाला मंडप में प्रार्थना कर राज्य और समाज की खुशहाली की शपथ ली।
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