
संवाददाता अंतर्कथा केरेडारी बालमुकुंद दास

केरेडारी कोयला खनन परियोजना में 10 मार्च 2026 से जारी ठहराव अब गंभीर जनाक्रोश में बदलता जा रहा है। 20 मार्च तक खदान में उत्पादन शुरू नहीं हो पाने से न केवल ऊर्जा क्षेत्र में अनिश्चितता बढ़ी है, बल्कि स्थानीय ग्रामीणों के बीच गहरी निराशा और असंतोष भी साफ नजर आने लगा है।

क्षेत्र के ग्रामीणों ने इस लंबे गतिरोध को लेकर खुलकर नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि जिस परियोजना से उनके रोजगार, छोटे व्यवसाय और दैनिक आजीविका जुड़ी हुई है, वही अब पूरी तरह ठप पड़ी है। “खदान हमारे लिए सिर्फ उद्योग नहीं, जीवन का आधार है,”—यह भावना अब खुले विरोध और प्रशासन के प्रति अविश्वास में बदलती जा रही है।
इस बीच, त्योहारों का महीना भी इस संकट की मार से अछूता नहीं रहा है। खासकर ईद जैसे पर्व, जब आमतौर पर लोग नए कपड़े खरीदते हैं और खुशियों के साथ जश्न मनाते हैं, इस बार फीके पड़ते नजर आ रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि आजीविका ठप होने से उनके पास त्योहार मनाने के लिए संसाधन ही नहीं बचे हैं—“इस बार ईद शायद सूनी ही गुजर जाएगी,” यह पीड़ा कई घरों में महसूस की जा रही है।
स्थिति को लेकर सबसे बड़ा सवाल सरकार की भूमिका पर उठ रहा है। इतने महत्वपूर्ण कोयला प्रोजेक्ट के लगातार बंद रहने के बावजूद अब तक कोई ठोस, समयबद्ध और प्रभावी हस्तक्षेप सामने नहीं आया है। जानकारों का मानना है कि यह केवल एक स्थानीय औद्योगिक विवाद नहीं, बल्कि राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा बन चुका है।
देश में बिजली की बढ़ती मांग और वित्तीय वर्ष के अंतिम चरण के बीच इस तरह का उत्पादन ठहराव कोयला आपूर्ति श्रृंखला पर सीधा असर डाल रहा है। यदि जल्द समाधान नहीं निकला, तो न केवल उत्पादन लक्ष्य प्रभावित होंगे, बल्कि पावर सेक्टर में भी दबाव और बढ़ सकता है।
ग्रामीणों का कहना है कि वे किसी भी प्रकार के विवाद या टकराव के पक्ष में नहीं हैं, बल्कि चाहते हैं कि खदान जल्द से जल्द चालू हो। कई स्थानों पर लोगों ने इस ठहराव की निंदा करते हुए इसे “अनावश्यक देरी” और “प्रशासनिक विफलता” करार दिया है।
अब हालात ऐसे मोड़ पर पहुंच चुके हैं जहां हर गुजरते दिन के साथ दबाव बढ़ता जा रहा है। सवाल यह है कि क्या झारखंड सरकार और केंद्र समय रहते निर्णायक हस्तक्षेप करेंगे, या फिर केरेडारी का यह संकट राज्य की औद्योगिक छवि और देश की ऊर्जा व्यवस्था पर गहरा असर छोड़ जाएगा।
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