

रांची: झारखंड विधानसभा के बजट सत्र के दौरान मंगलवार को असर्फी अस्पताल में मरीजों से अवैध वसूली और शवों को बंधक बनाने का मामला छाया रहा। झरिया विधायक रागिनी सिंह ने इस मुद्दे को लेकर विधानसभा परिसर में धरना दिया और बाद में सदन के भीतर भी सरकार को कटघरे में खड़ा किया।

*अस्पताल पर गंभीर आरोप और धरना*

सुबह सदन की कार्यवाही शुरू होने से पहले विधायक रागिनी सिंह विधानसभा परिसर के बाहर धरने पर बैठ गईं। उन्होंने असर्फी अस्पताल प्रबंधन पर संवेदनहीनता का आरोप लगाते हुए कहा कि अस्पताल प्रशासन मरीजों के परिजनों से अवैध तरीके से पैसों की उगाही कर रहा है। रागिनी सिंह ने भावुक होते हुए कहा, “यह बेहद अमानवीय है कि अस्पताल मृतकों के शव सौंपने के बदले भी परिजनों से पैसे की मांग करता है। गरीब जनता को इस तरह लूटा जाना बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।”
मामले को बढ़ता देख विधानसभा अध्यक्ष के निर्देश पर विधायक लुईस मरांडी और पूर्णिमा दास ने धरना स्थल पर जाकर रागिनी सिंह से वार्ता की। काफी समझाने और उचित मंच पर बात रखने के आश्वासन के बाद उन्होंने धरना समाप्त किया, लेकिन स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि कार्रवाई नहीं हुई तो आंदोलन और उग्र होगा।
*सदन में गूँजा मुद्दा: मंत्री से मांगा सीधा जवाब*
सदन की कार्यवाही के दौरान रागिनी सिंह ने स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी को उनके पुराने बयानों की याद दिलाई। उन्होंने सवाल किया कि जब मंत्री खुद कह चुके हैं कि बिल के कारण शव रोकना अवैध है और ऐसे अस्पतालों का निबंधन रद्द होगा, तो असर्फी अस्पताल पर अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई? उन्होंने मांग की कि या तो मंत्री स्पष्ट समय सीमा बताएं या पीड़ितों के पैसे वापस कराएं।
*स्वास्थ्य मंत्री का रुख*
जवाब में स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी ने कहा कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन कर रही है और सभी जिलों को सख्त दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि कई बार गंभीर बीमारियों के इलाज में चार-पांच लाख रुपये का खर्च आता है, जिसे अस्पताल प्रबंधन वसूलता है।
हालांकि, उन्होंने आश्वासन दिया कि यदि कहीं भी अवैध वसूली हुई है, तो जांच कर कार्रवाई की जाएगी। मंत्री ने यहाँ तक कहा कि यदि विवाद 20 हजार रुपये जैसी राशि का है, तो वह उसे वापस दिलाने का प्रयास करेंगे।
*संवेदनशीलता बनाम व्यवस्था*
विधायक रागिनी सिंह ने मंत्री के जवाब पर पलटवार करते हुए कहा कि यह मामला महज 20 हजार रुपये का नहीं है, बल्कि उस मानवीय संवेदना और व्यवस्था का है जो दम तोड़ रही है। उन्होंने जोर दिया कि सरकार को निजी अस्पतालों की मनमानी पर लगाम लगाने के लिए सख्त रुख अपनाना चाहिए ताकि भविष्य में किसी अन्य परिवार को ऐसी प्रताड़ना न झेलनी पड़े।
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